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न्याय यात्रा बनाम लोकतंत्र बचाओ अभियान: नारों की राजनीति में कहां हैं जनता के सवाल?

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों जनता के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए सड़क पर उतर चुके हैं। कांग्रेस ने ‘उत्तराखंड न्याय यात्रा’ के जरिए अंकिता भंडारी प्रकरण, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और कथित वोट चोरी जैसे मुद्दों को उठाने की रणनीति बनाई है। दूसरी ओर भाजपा ने ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान शुरू कर विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं और चुनावी प्रक्रिया को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया है। भाजपा के इस अभियान का घोषित कार्यक्रम 22 अक्टूबर से 30 नवंबर तक दो चरणों में रखा गया है, जिसके तहत सभी 13 जिलों में पदयात्राएं और जनसंवाद प्रस्तावित हैं।

दोनों अभियानों के नाम और राजनीतिक संदेश अलग हैं, लेकिन इनके पीछे एक साझा चुनावी लक्ष्य भी दिखाई देता है—जनता के बीच अपनी बात पहुंचाना और प्रतिद्वंद्वी दल के राजनीतिक नैरेटिव का जवाब देना। सवाल यह है कि क्या इन अभियानों के केंद्र में वास्तव में जनता के सवाल हैं या फिर चुनाव से पहले राजनीतिक जमीन तैयार करने की कवायद अधिक प्रभावी हो रही है?

कांग्रेस की न्याय यात्रा का केंद्र राज्य सरकार के कामकाज पर सवाल उठाना है। पार्टी अंकिता भंडारी प्रकरण में न्याय की मांग को प्रमुखता दे रही है। इसके साथ बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, महंगाई, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों को भी यात्रा का हिस्सा बनाया गया है। 22 अक्टूबर को गढ़वाल और कुमाऊं के अलग-अलग हिस्सों से चार दलों के माध्यम से यात्रा शुरू की गई। कांग्रेस ने इसे जनता के अधिकारों और जनहित के मुद्दों को लेकर सरकार तक आवाज पहुंचाने का अभियान बताया है।

दूसरी ओर भाजपा का ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान कांग्रेस के चुनावी और राजनीतिक रवैये को निशाना बनाता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस चुनावी पराजय स्वीकार करने के बजाय संवैधानिक संस्थाओं और चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा कर रही है। भाजपा का कहना है कि लोकतंत्र में जनादेश का सम्मान जरूरी है और विरोध के नाम पर संस्थाओं की विश्वसनीयता को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।

इस तरह कांग्रेस जहां सरकार से जवाब मांगने और विभिन्न मामलों में न्याय की बात कर रही है, वहीं भाजपा विपक्ष के आरोपों और उसके राजनीतिक तौर-तरीकों को मुद्दा बना रही है। दोनों दल अपने-अपने दृष्टिकोण से लोकतंत्र और जनहित की बात कर रहे हैं, लेकिन जनता के लिए महत्वपूर्ण यह है कि इन दावों के पीछे ठोस तथ्य और जवाबदेही कितनी है।

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने और बहुमत से सरकार बनाने तक सीमित नहीं है। इसमें विपक्ष की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सरकार के फैसलों पर सवाल उठाना, नीतियों की आलोचना करना, प्रशासनिक जवाबदेही मांगना और जनता की शिकायतों को सदन तथा सड़क तक पहुंचाना विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है। इसलिए हर आलोचना को अराजकता या लोकतंत्र विरोधी गतिविधि बताना उचित नहीं होगा।

इसी तरह चुनाव आयोग और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठने वाले सवालों को भी केवल राजनीतिक बयान मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। यदि किसी संस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्ति है तो उसका जवाब तथ्यों, पारदर्शिता और संस्थागत प्रक्रिया के माध्यम से दिया जाना चाहिए। आरोप लगाने वाले दलों की जिम्मेदारी भी है कि वे अपने दावों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करें। लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार है, लेकिन जवाबदेही और तथ्यपरकता की जिम्मेदारी भी है।

भाजपा का अभियान लोकतांत्रिक संस्थाओं के सम्मान और जनादेश की स्वीकार्यता पर जोर देता है। यह एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक विषय है। लेकिन इस अभियान की सार्थकता भी इसी बात से तय होगी कि जनसंवाद के दौरान जनता के स्थानीय और बुनियादी सवालों को कितना स्थान मिलता है। लोकतंत्र की रक्षा का अर्थ केवल राजनीतिक विरोध का जवाब देना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों और संस्थाओं की जवाबदेही को मजबूत करना भी है।

उत्तराखंड में कांग्रेस की न्याय यात्रा ने जिन मुद्दों को उठाया है, वे केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं हैं। अंकिता भंडारी प्रकरण में न्याय और पारदर्शिता की मांग लंबे समय से सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा रही है। बेरोजगार युवा भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता और समयबद्ध नियुक्तियों को लेकर जवाब चाहते हैं। महंगाई से आम परिवारों का बजट प्रभावित होता है। पहाड़ के गांव पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और रोजगार के सीमित अवसरों से जूझ रहे हैं। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का सवाल भी किसी एक राजनीतिक दल का विषय नहीं, बल्कि पूरे समाज की चिंता है।

कांग्रेस इन मुद्दों को उठाकर सरकार से जवाब मांग रही है। लेकिन विपक्ष के सामने भी यह चुनौती है कि वह केवल आरोपों तक सीमित न रहे। उसे यह बताना होगा कि सत्ता में आने पर इन समस्याओं के समाधान के लिए उसकी नीति क्या होगी। भर्ती व्यवस्था में पारदर्शिता कैसे आएगी? पहाड़ में रोजगार के अवसर कैसे बढ़ेंगे? महिला सुरक्षा के लिए क्या ठोस व्यवस्था होगी? भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए कौन से संस्थागत कदम उठाए जाएंगे? इन सवालों के स्पष्ट जवाब के बिना न्याय यात्रा का संदेश अधूरा रह सकता है।

भाजपा के सामने भी कम चुनौती नहीं है। राज्य में सरकार होने के नाते उसके पास अपने कामकाज और उपलब्धियों का विवरण देने का अवसर है। उसे यह बताना होगा कि बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, महिला सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही के मोर्चे पर क्या प्रगति हुई है। विपक्ष के आरोपों का जवाब केवल राजनीतिक प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि आंकड़ों, निर्णयों और जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से देना अधिक प्रभावी होगा।

किसी भी राजनीतिक यात्रा की सफलता का आकलन केवल उसमें शामिल लोगों की संख्या, नेताओं के काफिलों या सभाओं की भीड़ से नहीं होना चाहिए। असली कसौटी यह है कि यात्रा के दौरान जनता की कितनी समस्याएं सामने आईं, कितने सवालों को दर्ज किया गया और उनके समाधान के लिए आगे क्या किया गया।

कांग्रेस की न्याय यात्रा के सामने भी यही परीक्षा है। यात्रा के दौरान उठाए गए मुद्दों को आगे विधानसभा, प्रशासन और जनआंदोलन के स्तर पर कितनी निरंतरता से उठाया जाएगा? क्या पार्टी इन समस्याओं पर कोई ठोस वैकल्पिक नीति और समयबद्ध कार्ययोजना भी जनता के सामने रखेगी? दूसरी ओर भाजपा के प्रदेशव्यापी अभियान को भी इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए। सभी 13 जिलों में पदयात्राएं और जनसंवाद तभी सार्थक होंगे, जब जनता को केवल सरकार की उपलब्धियां गिनाने के बजाय उसकी शिकायतें सुनने और उनका समाधान करने का अवसर भी मिले।

राजनीतिक दल अक्सर यात्राओं को जनसंपर्क का माध्यम बताते हैं। लेकिन जनसंपर्क और जनसंवाद में फर्क है। जनसंपर्क में नेता जनता तक अपनी बात पहुंचाता है, जबकि जनसंवाद में जनता की बात भी सुनी जाती है। यदि दोनों दल केवल अपने-अपने भाषण सुनाने और विरोधियों पर आरोप लगाने में व्यस्त रहे तो यात्राएं चुनावी गतिविधि बनकर रह जाएंगी।

राज्य गठन के बाद उत्तराखंड ने विकास की कई उपलब्धियां देखी हैं, लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों की चुनौतियां अब भी गंभीर हैं। गांवों से पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं का असमान वितरण, युवाओं के लिए स्थायी रोजगार, आपदा प्रबंधन, महिला सुरक्षा और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग जैसे विषय किसी एक यात्रा या अभियान से हल नहीं होने वाले। इनके लिए निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक जवाबदेही और स्पष्ट नीतियों की आवश्यकता है।

कांग्रेस की न्याय यात्रा और भाजपा का लोकतंत्र बचाओ अभियान, दोनों को जनता के सामने अपने-अपने दावों की कसौटी प्रस्तुत करनी होगी। कांग्रेस को बताना होगा कि न्याय की मांग के साथ वह शासन का कौन-सा वैकल्पिक मॉडल पेश करती है। भाजपा को स्पष्ट करना होगा कि लोकतंत्र और जनादेश की बात के साथ वह नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं के समाधान के लिए क्या कर रही है। दोनों दलों को यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता स्वाभाविक है, लेकिन उसे संस्थाओं की गरिमा, सामाजिक सौहार्द और जनहित से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

आखिरकार जनता को इस बात से कम सरोकार है कि किस दल की यात्रा में कितने नेता शामिल हुए और किस अभियान में कितनी पदयात्राएं निकलीं। उसे रोजगार, बेहतर शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, सुरक्षित माहौल, पारदर्शी भर्ती और भ्रष्टाचार से राहत चाहिए। चुनावी मौसम में उठाए गए मुद्दे चुनाव के बाद भी राजनीतिक एजेंडे में बने रहने चाहिए।

लोकतंत्र की असली परीक्षा नारों में नहीं, जवाबदेही में है। कांग्रेस की न्याय यात्रा हो या भाजपा का लोकतंत्र बचाओ अभियान—दोनों की विश्वसनीयता इस बात से तय होगी कि वे जनता के सवालों को कितनी गंभीरता से उठाते हैं और उनके समाधान के लिए कितनी ठोस पहल करते हैं। उत्तराखंड को केवल यात्राओं और नारों की राजनीति नहीं, बल्कि ऐसी राजनीति चाहिए जिसमें सत्ता जवाब दे और विपक्ष विकल्प प्रस्तुत करे।

 

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