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सरकारी जमीनों को निजी हाथों में सौंपने पर कांग्रेस का हमला, राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग

जॉर्ज एवरेस्ट की 142 एकड़ जमीन की लीज निरस्त करने की मांग, यूआईआईडीबी के तीन टेंडर रद्द करने को कहा

गणेश गोदियाल के नेतृत्व में 13 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने सौंपा ज्ञापन, मंत्री गणेश जोशी और सहकारिता भर्ती प्रकरण भी उठाया

देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी जमीनों और बेशकीमती संपत्तियों को निजी कंपनियों के हाथों में सौंपने का मामला अब राजनीतिक तूल पकड़ने लगा है। प्रदेश कांग्रेस ने धामी सरकार पर राज्य की बहुमूल्य जमीनों और ऐतिहासिक धरोहरों को कौड़ियों के भाव निजी हाथों में देने का आरोप लगाते हुए मोर्चा खोल दिया है। इसी क्रम में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल के नेतृत्व में 13 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात कर पूरे मामले में हस्तक्षेप की मांग की। कांग्रेस ने सरकारी जमीनों को निजी हाथों में सौंपने से जुड़े निर्णयों को निरस्त करने, संपत्तियों को उनके मूल विभागों को वापस लौटाने और संबंधित मामलों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठाई।

राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में कांग्रेस ने कहा कि उत्तराखंड की सरकारी जमीनें और ऐतिहासिक भवन प्रदेश की जनता की संपत्ति हैं। इन संपत्तियों का उपयोग जनहित में होना चाहिए, लेकिन सरकार के फैसलों के कारण राज्य की बेशकीमती जमीनें निजी कंपनियों के हवाले की जा रही हैं। पार्टी ने आरोप लगाया कि जमीनों के हस्तांतरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया गया। प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से आग्रह किया कि वह राज्य की संपत्तियों के संवैधानिक संरक्षक के रूप में इस मामले का संज्ञान लेकर सरकार के फैसलों की समीक्षा कराएं।

संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देकर सरकार के फैसलों पर सवाल

कांग्रेस ने अपने ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 154 और 166 का उल्लेख करते हुए राज्यपाल का ध्यान उनकी संवैधानिक भूमिका की ओर आकर्षित किया। ज्ञापन में कहा गया कि अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित है, जबकि अनुच्छेद 166 के तहत राज्य सरकार की कार्यवाहियां राज्यपाल के नाम से संचालित होती हैं। जिन शासनादेशों के माध्यम से सरकारी जमीनों और धरोहर भवनों को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, वे भी राज्यपाल के नाम से जारी किए गए हैं। ऐसे में राज्य की इन महत्वपूर्ण संपत्तियों के संरक्षण और उनसे जुड़े फैसलों की संवैधानिक समीक्षा जरूरी है।

प्रतिनिधिमंडल ने विशेष रूप से 20 दिसंबर 2022 के कैबिनेट निर्णय से जुड़े शासनादेश पर आपत्ति जताई। कांग्रेस का कहना है कि इस शासनादेश के जरिए विभिन्न विभागों की सरकारी जमीनों के संबंध में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार मुख्यमंत्री को दे दिया गया। पार्टी ने इसे संविधान के अनुच्छेद 164(2) में वर्णित मंत्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व और राज्य की कार्य संचालन नियमावली की भावना के विपरीत बताया। कांग्रेस का आरोप है कि इस व्यवस्था के चलते सरकारी संपत्तियों के संबंध में महत्वपूर्ण फैसले सामूहिक कैबिनेट प्रक्रिया के बजाय मुख्यमंत्री के स्तर पर लिए जाने लगे।

जॉर्ज एवरेस्ट की 142 एकड़ जमीन का मामला सबसे प्रमुख

राज्यपाल के सामने कांग्रेस ने मसूरी स्थित जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट का मामला प्रमुखता से उठाया। प्रतिनिधिमंडल ने आरोप लगाया कि हजारों करोड़ रुपये बाजार मूल्य वाली 142 एकड़ जमीन और ऐतिहासिक महत्व की राष्ट्रीय धरोहर को उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद के माध्यम से एक निजी कंपनी को 15 वर्षों के लिए लीज पर दे दिया गया। इसके एवज में कंपनी से लगभग एक करोड़ रुपये सालाना किराया निर्धारित किया गया।

कांग्रेस ने सवाल उठाया कि इतनी महत्वपूर्ण और बेशकीमती संपत्ति को इतने कम वार्षिक किराये पर निजी कंपनी को सौंपने का निर्णय किस आधार पर लिया गया। पार्टी का कहना है कि यह केवल जमीन का मामला नहीं, बल्कि राज्य की ऐतिहासिक विरासत और सार्वजनिक संपत्तियों से जुड़ा गंभीर विषय है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में उत्तराखंड की कार्य संचालन नियमावली और अधिप्राप्ति नियमावली के प्रावधानों की अनदेखी की गई।

प्रतिनिधिमंडल ने जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की लीज तत्काल निरस्त करने की मांग की। साथ ही पूरे प्रकरण की उच्च न्यायालय की निगरानी में स्वतंत्र जांच कराने की मांग भी राज्यपाल के समक्ष रखी, ताकि जमीन को निजी कंपनी को सौंपने की प्रक्रिया, निर्णय लेने वाले अधिकारियों और निर्धारित शर्तों की वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

पटवा डांगर से आईडीपीएल तक कई संपत्तियों का मुद्दा

कांग्रेस ने केवल जॉर्ज एवरेस्ट तक ही अपना विरोध सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में स्थित कई महत्वपूर्ण सरकारी जमीनों का मामला भी उठाया। प्रतिनिधिमंडल ने पटवा डांगर, नगऊ, धनोल्टी-मगरा, आईडीपीएल ऋषिकेश, डाकपत्थर, रामगढ़ और एचएमटी रानीबाग की संपत्तियों को लेकर सरकार के निर्णयों पर सवाल खड़े किए।

ज्ञापन में आरोप लगाया गया कि सरकारी जमीनों और संपत्तियों को उत्तराखंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड (यूआईआईडीबी) को सौंपने के फैसलों में पारदर्शिता नहीं बरती गई। कांग्रेस ने कहा कि इन संपत्तियों का भविष्य तय करने से पहले संबंधित विभागों, स्थानीय हितों और सार्वजनिक उपयोगिता को ध्यान में रखा जाना चाहिए था। पार्टी ने सवाल उठाया कि आखिर सरकारी विभागों की जमीनों को एक बोर्ड के माध्यम से निजी निवेश और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए उपलब्ध कराने की जरूरत क्यों पड़ी और इसके पीछे क्या प्रक्रिया अपनाई गई।

यूआईआईडीबी के तीन टेंडर तत्काल निरस्त करने की मांग

कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने यूआईआईडीबी से जुड़े तीन टेंडरों को तत्काल निरस्त करने की मांग भी की। इनमें पटवा डांगर, हरिद्वार स्थित अलकनंदा होटल और ऋषिकेश के निरीक्षण भवन से संबंधित टेंडर शामिल हैं। पार्टी का आरोप है कि इन सरकारी संपत्तियों को लेकर अपनाई गई प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जांच पूरी होने तक संबंधित टेंडरों को आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए।

कांग्रेस ने राज्यपाल से मांग की कि सरकारी जमीनों और भवनों को यूआईआईडीबी को हस्तांतरित करने से संबंधित सभी निर्णयों की समीक्षा कराई जाए। साथ ही जिन संपत्तियों को उनके मूल विभागों से लेकर दूसरे उपयोग के लिए देने की प्रक्रिया शुरू की गई है, उन्हें वापस संबंधित विभागों को सौंपा जाए।

गणेश जोशी और सहकारिता भर्ती प्रकरण भी उठाया

राज्यपाल से मुलाकात के दौरान कांग्रेस ने सरकार को घेरने के लिए अन्य मुद्दे भी उठाए। प्रतिनिधिमंडल ने कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति से जुड़े मामले का उल्लेख करते हुए इस पर निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की। इसके अलावा कोरोना काल के दौरान सहकारिता विभाग में हुई भर्तियों में कथित अनियमितताओं का मुद्दा भी राज्यपाल के समक्ष रखा गया।

कांग्रेस का कहना है कि प्रदेश में सरकारी संपत्तियों के प्रबंधन से लेकर भर्ती प्रक्रिया तक कई ऐसे मामले हैं, जिनमें पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है। पार्टी ने इन सभी मामलों की निष्पक्ष जांच कराने और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

सरकारी संपत्तियों को लेकर सरकार की जवाबदेही तय करने की कोशिश

कांग्रेस की राज्यपाल से यह मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब प्रदेश में सरकारी जमीनों के उपयोग, निवेश और निजी कंपनियों को संपत्तियां सौंपने को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो रही है। कांग्रेस ने इस पूरे प्रकरण को प्रदेश के संसाधनों और सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा से जोड़ते हुए सरकार की जवाबदेही तय करने की कोशिश की है।

पार्टी का तर्क है कि सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन सरकारी जमीनें और ऐतिहासिक धरोहरें हमेशा प्रदेश की जनता की होती हैं। इसलिए इनका हस्तांतरण किसी भी स्थिति में अपारदर्शी तरीके से नहीं होना चाहिए। कांग्रेस ने राज्यपाल से मांग की कि सरकारी जमीनों को निजी हाथों में सौंपने से जुड़े फैसलों पर रोक लगाई जाए, विवादित लीज और टेंडर निरस्त किए जाएं तथा पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए।

इस मुलाकात के जरिए कांग्रेस ने साफ संकेत दिया है कि वह सरकारी जमीनों के मुद्दे को आने वाले दिनों में भी राजनीतिक और सार्वजनिक मंचों पर उठाती रहेगी। अब देखना होगा कि राज्यपाल की ओर से इस ज्ञापन पर क्या कदम उठाया जाता है और सरकार इन आरोपों पर क्या जवाब देती है।

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