गैरसैंण/देहरादून। पहाड़ की जिस धरती को उत्तराखंड आंदोलन के दौरान राज्य की पहचान और भविष्य का केंद्र बनाने का सपना देखा गया था, वहां आज भी उम्मीदें सरकारी घोषणाओं की राह देख रही हैं। विधानसभा सत्र के नाम पर कुछ दिनों के लिए गैरसैंण में सत्ता का पूरा तामझाम उतरता है। सड़कों पर वीआईपी गाड़ियों के काफिले दौड़ते हैं, सरकारी भवन रोशनी से जगमगाते हैं, अधिकारियों की बैठकें होती हैं और सुरक्षा का भारी बंदोबस्त दिखाई देता है। लेकिन जैसे ही सत्र समाप्त होता है, सत्ता की यह चकाचौंध भी अपने साथ समेट ली जाती है। पीछे रह जाता है वही पहाड़, वही सन्नाटा और वर्षों से अधूरे पड़े सवाल।
27 अक्टूबर को शुरू हुए विधानसभा सत्र के बाद गैरसैंण की तस्वीर एक बार फिर यही कहानी बयां कर रही है। दो दिनों तक भराड़ीसैंण विधानसभा परिसर और आसपास के क्षेत्र में खूब चहल-पहल रही, लेकिन डेढ़ दिन की सदन की कार्यवाही के बाद सब कुछ पहले जैसा हो गया। माननीयों के काफिले लौट गए, अधिकारियों का जमावड़ा खत्म हो गया और विधानसभा परिसर की रोशनी के साथ गैरसैंण की रौनक भी बुझ गई। स्थानीय लोगों के लिए यह दृश्य नया नहीं है। हर बार सत्र के दौरान कुछ दिनों के लिए राजधानी का एहसास कराया जाता है, लेकिन सत्र खत्म होते ही गैरसैंण फिर सरकारी प्राथमिकताओं से दूर नजर आने लगता है।
सत्ता की चकाचौंध में दब गए पहाड़ के सवाल
इस बार स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि सरकार गैरसैंण को लेकर कोई बड़ा फैसला करेगी। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले गैरसैंण को जिला बनाने की चर्चाओं ने इस उम्मीद को और मजबूत किया था। लोगों को लगा था कि सरकार इस क्षेत्र को प्रशासनिक पहचान देने के साथ विकास की नई राह खोलेगी। लेकिन सत्र समाप्त हो गया और जिला बनाने की मांग पर कोई घोषणा नहीं हुई। स्थायी राजधानी का सवाल भी जस का तस रह गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर गैरसैंण में विधानसभा सत्र आयोजित करने का उद्देश्य क्या है? यदि यहां सदन की बैठक का मकसद पहाड़ की समस्याओं को सत्ता के केंद्र में लाना है तो फिर इन समस्याओं पर पर्याप्त चर्चा क्यों नहीं होती? सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पेयजल, पलायन और स्थानीय युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे आज भी पहाड़ के सामने खड़े हैं। लेकिन डेढ़ दिन की कार्यवाही में इन सवालों को कितना स्थान मिला, यह अपने आप में बहस का विषय है।
बिना प्रश्नकाल के सत्र स्थगित होने से भी नाराजगी बढ़ी है। स्थानीय लोगों और आंदोलनकारियों का कहना है कि विधायकों को अपने क्षेत्रों की समस्याएं उठाने और सरकार से जवाब मांगने का पर्याप्त अवसर ही नहीं मिला। जिस सदन से पहाड़ की आवाज पूरे प्रदेश तक पहुंचनी चाहिए थी, वहां की कार्यवाही ही इतनी संक्षिप्त रही कि जनता की उम्मीदें अधूरी रह गईं।
गैरसैंण को राजधानी का प्रतीक बनाया, स्थायी व्यवस्था नहीं दी
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के पीछे पहाड़ के लोगों की एक बड़ी आकांक्षा यह भी थी कि अलग राज्य बनने के बाद सत्ता और विकास का केंद्र पहाड़ों में स्थापित होगा। गैरसैंण को इसी भावना के प्रतीक के रूप में देखा गया। लेकिन राज्य गठन के वर्षों बाद भी गैरसैंण को लेकर स्थायी राजधानी का सवाल राजनीतिक बहसों और आंदोलनों तक सीमित है।
स्थानीय लोगों की शिकायत है कि विधानसभा सत्र के दौरान जिस क्षेत्र में मंत्रियों और अधिकारियों के लिए तमाम व्यवस्थाएं जुटाई जाती हैं, वहां सालभर प्रशासनिक गतिविधियां बढ़ाने की दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठाए जाते। यदि गैरसैंण को वास्तव में विकास का केंद्र बनाना है तो यहां नियमित सरकारी कार्यालय, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, उच्च शिक्षा के संस्थान, रोजगार के अवसर और मजबूत सड़क संपर्क विकसित करना होगा। केवल विधानसभा भवन की मौजूदगी से क्षेत्र की तस्वीर नहीं बदल सकती।
जिला बनाने की मांग भी इसी अपेक्षा से जुड़ी है। स्थानीय लोगों का मानना है कि जिला बनने से प्रशासनिक कामकाज नजदीक आएगा और दूरस्थ गांवों के लोगों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी। लेकिन इस बार भी उनकी उम्मीदों को कोई ठोस जवाब नहीं मिला।
सरकारी खर्च पर सवाल, जवानों की सुविधाओं को लेकर भी नाराजगी
सत्र के आयोजन के बाद राज्य आंदोलनकारियों ने सरकारी खर्च को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मंत्रियों, विधायकों और अधिकारियों के आवागमन, ठहरने, भोजन, वाहनों और सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ी धनराशि खर्च होती है। जब सदन की कार्यवाही ही डेढ़ दिन चली तो इतने बड़े सरकारी अमले और व्यवस्थाओं पर खर्च का औचित्य क्या था? आंदोलनकारियों ने सरकार से यह भी सवाल किया है कि सत्र के आयोजन पर कुल कितना खर्च हुआ और इससे गैरसैंण के स्थानीय लोगों को क्या स्थायी लाभ मिला।
आंदोलनकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था में तैनात जवानों की परिस्थितियों पर भी चिंता जताई। उनका आरोप है कि एक ओर वीआईपी ठहराव स्थलों पर हीटर और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था थी, वहीं दूसरी ओर दूर-दराज के जिलों से पहुंचे जवानों को कड़कड़ाती ठंड में ड्यूटी के दौरान परेशानियों का सामना करना पड़ा। उनका कहना है कि सरकारी आयोजनों में सुविधाओं का इंतजाम केवल माननीयों और अधिकारियों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यवस्था संभालने वाले कर्मचारियों और जवानों की जरूरतों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
‘गैरसैंण को सियासी पर्यटन का केंद्र बना दिया’
वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी सुरेश कुमार बिष्ट ने सत्र की अवधि और आयोजन पर तीखी नाराजगी जताई। उनका कहना है कि यदि सरकार को केवल डेढ़ दिन ही सदन चलाना था तो करोड़ों रुपये खर्च कर पूरी सरकारी मशीनरी के साथ गैरसैंण आने का औचित्य क्या था? यह काम देहरादून में बैठकर भी किया जा सकता था। बिष्ट ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार पहाड़ की जनता को आश्वासनों में उलझाए हुए है और गैरसैंण को केवल सियासी पर्यटन का केंद्र बना दिया गया है।
उन्होंने सवाल उठाया कि चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दलों को गैरसैंण की याद क्यों आने लगती है? यदि सरकार वास्तव में पहाड़ और गैरसैंण के विकास को लेकर गंभीर है तो स्थायी राजधानी और जिला गठन जैसे मुद्दों पर निर्णय लेने से पीछे क्यों हटती है? बिष्ट के मुताबिक, जनता अब केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाला बदलाव चाहती है।
‘बहुमत होने के बाद भी नहीं लिया फैसला’
स्थायी राजधानी संयुक्त संघर्ष समिति के अध्यक्ष नारायण सिंह बिष्ट ने भी सरकार की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार को गैरसैंण और पहाड़ के सरोकारों से कोई लेना-देना नहीं है। यदि सरकार गैरसैंण को लेकर गंभीर है तो इसे पूर्ण स्थायी राजधानी घोषित करने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।
बिष्ट ने कहा कि सरकार के पास बहुमत है और गैरसैंण को लेकर फैसला लेने का अवसर भी था, लेकिन इसके बावजूद कोई ऐतिहासिक निर्णय नहीं लिया गया। उनके अनुसार, जनता को उम्मीद थी कि इस बार सत्र में पहाड़ के हितों से जुड़ी कोई बड़ी घोषणा होगी, लेकिन फिर निराशा ही हाथ लगी। उन्होंने सत्र के आयोजन पर खर्च होने वाले सरकारी धन को लेकर भी जवाबदेही तय करने की मांग की।
‘जनता के टैक्स का पैसा खर्च हुआ, लेकिन मिला क्या?’
गैरसैंण विकासखंड के खनसर क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व जिला पंचायत सदस्य अवतार सिंह पुंडीर ने भी सत्र को लेकर नाराजगी जताई। उन्होंने इसे जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी बताते हुए सवाल किया कि इतने बड़े आयोजन के बाद भी क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं पर कोई ठोस फैसला क्यों नहीं हुआ। उनका कहना है कि कुछ दिनों की सरकारी चहल-पहल से गैरसैंण का विकास नहीं होने वाला। इसके लिए सालभर काम करने वाली व्यवस्था और क्षेत्र की जरूरतों के अनुरूप योजनाएं जरूरी हैं।
अगले सत्र तक फिर इंतजार करेगा गैरसैंण?
गैरसैंण की कहानी अब हर विधानसभा सत्र के बाद लगभग एक जैसी हो गई है। सत्र से पहले उम्मीदें जगती हैं, आयोजन के दौरान सत्ता की पूरी ताकत पहाड़ में दिखाई देती है और सत्र समाप्त होते ही वही पुराना सन्नाटा लौट आता है। इस बार भी गैरसैंण को न जिला बनने की सौगात मिली और न स्थायी राजधानी को लेकर कोई ठोस फैसला हुआ। पहाड़ के मुद्दों पर व्यापक चर्चा की उम्मीद भी अधूरी रह गई।
सवाल केवल इतना नहीं है कि विधानसभा सत्र कितने दिन चला। असली सवाल यह है कि गैरसैंण को लेकर सरकार की दीर्घकालिक योजना क्या है? क्या यहां केवल विधानसभा का आयोजन कर राज्य आंदोलन की भावना को औपचारिकता में बदल दिया जाएगा, या इसे वास्तव में प्रशासन, विकास और रोजगार का केंद्र बनाने की दिशा में कदम उठेंगे? आंदोलनकारियों की नाराजगी और स्थानीय लोगों की निराशा इसी सवाल के इर्द-गिर्द है। गैरसैंण को अब कुछ दिनों की रोशनी और वीआईपी आवाजाही नहीं, बल्कि सालभर चलने वाला विकास चाहिए।






