नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी के बकाया वेतन पर विचार करे सक्षम प्राधिकारी, केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को लेकर सरकार और अधिकारियों के बीच कानूनी विवाद जारी
नैनीताल। उत्तराखंड के दो वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का विवाद अब उनके बकाया वेतन तक पहुंच गया है। नैनीताल हाईकोर्ट ने दोनों अधिकारियों के लंबित वेतन के मामले में सक्षम प्राधिकारी को भुगतान पर विचार करने के निर्देश दिए हैं। बुधवार को देर रात तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर 2026 निर्धारित की है।
मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने की। दोनों अधिकारी उत्तराखंड पुलिस में पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) स्तर पर तैनात थे। उनकी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को लेकर राज्य सरकार और अधिकारियों के बीच विवाद चल रहा है।
बिना सहमति प्रतिनियुक्ति पर उठाए सवाल
मामले के अनुसार, उत्तराखंड सरकार ने 16 फरवरी 2026 को दोनों अधिकारियों के नाम केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए भेजे थे। इसके बाद पांच मार्च को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2005 बैच की आईपीएस अधिकारी नीरू गर्ग को भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) और 2006 बैच के अधिकारी अरुण मोहन जोशी को सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में डीआईजी पद पर नियुक्त किया। छह मार्च को राज्य सरकार ने दोनों अधिकारियों को कार्यमुक्त कर दिया।
दोनों अधिकारियों ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट), नई दिल्ली में इन आदेशों को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि पांच साल की प्रतिनियुक्ति संबंधी रोक लागू होने के बावजूद उनके नाम भेजे गए और इस प्रक्रिया में उनकी सहमति भी नहीं ली गई। उन्होंने आईजी स्तर पर तैनात होने के बावजूद डीआईजी पद पर नियुक्त किए जाने पर भी सवाल उठाए।
कैट ने रद्द किए थे प्रतिनियुक्ति के आदेश
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने 10 सितंबर 2026 को दोनों अधिकारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए प्रतिनियुक्ति और कार्यमुक्ति संबंधी आदेश निरस्त कर दिए थे। साथ ही उत्तराखंड कैडर में उनके संबंधित पदों पर बहाली और सेवा से जुड़े देय लाभ देने के निर्देश दिए थे। राज्य सरकार ने कैट के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
अदालत में अधिकार क्षेत्र का सवाल
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अधिकारियों की ओर से राज्य सरकार की याचिका के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल उठाया गया। उनका कहना था कि कैट की प्रधान पीठ नई दिल्ली में है और उसके फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी जानी चाहिए। इसी बीच बकाया वेतन का मुद्दा भी अदालत में उठा। इस पर खंडपीठ ने सक्षम प्राधिकारी को वेतन जारी करने के संबंध में विचार करने के निर्देश दिए।
अब 18 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई पर निगाहें रहेंगी। प्रतिनियुक्ति, कार्यमुक्ति, सेवा लाभ और वेतन से जुड़े इस विवाद में अदालत के अगले रुख से दोनों अधिकारियों की स्थिति को लेकर तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।






