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हाईकोर्ट शिफ्टिंग पर वन मंत्रालय का बड़ा झटका, बेलबाबा की जमीन का प्रस्ताव खारिज

हल्द्वानी के बेलबाबा क्षेत्र में 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि पर हाईकोर्ट परिसर बनाने की योजना पर लगी रोक,
123 पेड़ों के कटान और गैर-वन भूमि के विकल्पों की पर्याप्त तलाश नहीं करने पर समिति ने जताई आपत्ति,

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी के बेलबाबा क्षेत्र में स्थानांतरित करने की योजना को बड़ा झटका लगा है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने हाईकोर्ट के नए परिसर के लिए 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के उपयोग से जुड़े प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। समिति ने साफ किया है कि परियोजना के लिए वन भूमि के इस्तेमाल से पहले गैर-वन भूमि के विकल्पों की गंभीरता से तलाश जरूरी है। प्रस्ताव में 123 पेड़ों के कटान की बात भी शामिल थी।

इस फैसले के बाद हाईकोर्ट को हल्द्वानी शिफ्ट करने की प्रक्रिया पर फिलहाल सवाल खड़े हो गए हैं। समिति ने राज्य सरकार और संबंधित कार्यदायी एजेंसी को निर्देश दिया है कि वे परियोजना के लिए उपयुक्त गैर-वन भूमि तलाशें। यानी हाईकोर्ट शिफ्टिंग की योजना को आगे बढ़ाने के लिए अब नए स्थान और जमीन के विकल्प पर विचार करना होगा।

जिलाधिकारी के प्रस्ताव को समिति ने नहीं दी मंजूरी

जानकारी के अनुसार, नैनीताल के जिलाधिकारी की ओर से हल्द्वानी के बेलबाबा क्षेत्र के लामाचौड़, भाखड़ा रेंज स्थित तराई केंद्रीय वन प्रभाग की 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि को हाईकोर्ट परिसर के लिए उपलब्ध कराने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया था। इस प्रस्ताव में वन भूमि के उपयोग की अनुमति मांगी गई थी। इसके विरोध में हाईकोर्ट के अधिवक्ता कौशल साह जगाती ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के समक्ष आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने इस संबंध में हाईकोर्ट में भी याचिका दायर की थी, हालांकि अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी।

अब क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट अधिवक्ता कौशल साह जगाती और अधिवक्ता कार्तिकेय हरि गुप्ता को प्राप्त हुई है। हालांकि, यह रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों के मुताबिक, प्रस्ताव को वन संरक्षण से जुड़े नियमों और वैकल्पिक भूमि के परीक्षण के आधार पर मंजूरी नहीं दी गई।

गैर-वन भूमि के विकल्पों की तलाश पर सवाल

समिति की सबसे अहम आपत्ति यह रही कि जिला प्रशासन ने गैर-वन भूमि उपलब्ध नहीं होने का प्रमाण पत्र तो दिया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि हाईकोर्ट परिसर के लिए दूसरे संभावित गैर-वन क्षेत्रों की विधिवत तलाश की गई थी या नहीं। समिति का मानना है कि हाईकोर्ट परिसर जैसी परियोजना के लिए सीधे आरक्षित वन भूमि के उपयोग का रास्ता अपनाने के बजाय पहले गैर-वन भूमि की संभावनाओं का पूरा परीक्षण किया जाना चाहिए था।

समिति ने यह भी उल्लेख किया कि इससे पहले हल्द्वानी के गौलापार क्षेत्र में हाईकोर्ट शिफ्टिंग से जुड़ा प्रस्ताव भी वन भूमि और पेड़ों के कटान के मुद्दे पर खारिज हो चुका है। उस प्रस्ताव में 4,238 पेड़ों के कटान और आवासीय प्रावधानों को लेकर आपत्तियां उठी थीं। 24 जनवरी 2024 को उसे मंजूरी नहीं दी गई थी। अब बेलबाबा का प्रस्ताव भी इसी तरह की वन संरक्षण संबंधी आपत्तियों के चलते आगे नहीं बढ़ पाया।

हाईकोर्ट में मुकदमों का बोझ बढ़ने का दिया गया था तर्क

समिति की बैठक में हाईकोर्ट के प्रतिनिधि ने नए परिसर की जरूरत बताते हुए कहा कि नैनीताल स्थित मौजूदा भवन में मुकदमों और कर्मचारियों की संख्या बढ़ने के कारण जगह की कमी हो रही है। बैठक में बताया गया कि वर्ष 2010 में हाईकोर्ट में लंबित मामलों की संख्या करीब चार हजार थी, जो अब बढ़कर 64 हजार से अधिक हो गई है। नैनीताल के प्रमुख पर्यटन स्थल होने के कारण यहां आने वाले वादकारियों को आवास और होटलों पर अधिक खर्च करना पड़ता है। इसके साथ ही शहर में यातायात जाम की समस्या भी गंभीर बनी रहती है।

इन्हीं परिस्थितियों को आधार बनाकर हाईकोर्ट को हल्द्वानी के बेलबाबा क्षेत्र में स्थानांतरित करने की जरूरत बताई गई थी। हालांकि, समिति ने परियोजना की आवश्यकता पर दिए गए तर्कों के बावजूद वन भूमि के इस्तेमाल को उचित नहीं माना और वैकल्पिक जमीन की तलाश को प्राथमिकता देने को कहा।

करीब सात करोड़ रुपये से अधिक की लागत का था प्रस्ताव

प्रस्ताव के वित्तीय आकलन के अनुसार, 30 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग के बदले नेट प्रेजेंट वैल्यू के रूप में 3 करोड़ 68 लाख 57 हजार 700 रुपये निर्धारित किए गए थे। इसके अलावा क्षतिपूरक वनीकरण के लिए अलग-अलग तहसीलों और क्षेत्रों में 60 हेक्टेयर गैर-वन भूमि चिह्नित की गई थी। इस पर अनुमानित खर्च 3 करोड़ 46 लाख 45 हजार 883 रुपये बताया गया था। इस तरह वन भूमि हस्तांतरण और क्षतिपूरक वनीकरण से जुड़ी निर्धारित राशि सात करोड़ रुपये से अधिक थी।

परियोजना के निर्माण के दौरान रोजगार सृजन का तर्क भी दिया गया था। प्रस्ताव में लगभग 1,450 लोगों को स्थायी रोजगार और करीब 4,98,546 मानव-दिवस का अस्थायी रोजगार उपलब्ध होने की संभावना जताई गई थी। इसके बावजूद समिति ने वन भूमि के उपयोग की अनुमति देने के बजाय गैर-वन भूमि के विकल्प तलाशने के निर्देश दिए।

अब नई जमीन की तलाश बनेगी सबसे बड़ी चुनौती

बेलबाबा क्षेत्र के प्रस्ताव को खारिज किए जाने के बाद हाईकोर्ट शिफ्टिंग की योजना के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। अब राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों को ऐसी जमीन तलाशनी होगी, जो वन भूमि न हो और परियोजना की जरूरतों के अनुरूप भी हो। इसके बाद ही शिफ्टिंग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकेगा।

फिलहाल समिति के फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हाईकोर्ट के नए परिसर के लिए आरक्षित वन भूमि का इस्तेमाल आसान नहीं होगा। सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक ओर नैनीताल स्थित मौजूदा हाईकोर्ट परिसर में बढ़ते मुकदमों और जगह की कमी का समाधान करना और दूसरी ओर पर्यावरणीय नियमों के अनुरूप उपयुक्त वैकल्पिक भूमि तलाशना।

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