बेटे के DNA टेस्ट और दोबारा जांच की मांग
2003 की घटना का हवाला देकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में जेनी ने खोले पुराने मामले के पन्ने, पूर्व मंत्री पर लगाए गंभीर आरोप; 2027 चुनाव से पहले फिर गरमाई प्रदेश की राजनीति
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जेनी प्रकरण ने एक बार फिर प्रदेश की सियासत में हलचल मचा दी है। पूर्व कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत पर जेनी की ओर से लगाए गए गंभीर आरोपों ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। शनिवार को देहरादून में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जेनी ने वर्ष 2003 में अपने साथ दुष्कर्म किए जाने का आरोप लगाया और पूरे मामले की दोबारा निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठाई। उन्होंने अपने बेटे का दोबारा DNA टेस्ट कराने की मांग करते हुए कहा कि वह अपने बेटे को उसके पिता का नाम दिलाना चाहती हैं।
जेनी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि कथित घटना के समय उनकी उम्र महज 16 वर्ष थी। उन्होंने आरोप लगाया कि करीब डेढ़ से दो महीने तक उन्हें अलग-अलग स्थानों और होटलों में ले जाकर उनके साथ जबरदस्ती की गई। जेनी के मुताबिक, गर्भवती होने के बाद उन्हें मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा और उन्हें पागलखाने में रखा गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने पुराने घटनाक्रम का जिक्र करते हुए मामले की जांच प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े किए।
DNA टेस्ट पर उठाए सवाल, बेटे का दोबारा सैंपल लेने की मांग

इस पूरे प्रकरण में जेनी ने सबसे महत्वपूर्ण सवाल अपने बेटे के DNA टेस्ट को लेकर उठाया है। उनका दावा है कि पूर्व में हुई जांच प्रक्रिया को लेकर उन्हें संदेह है। जेनी का कहना है कि उनके बेटे का सैंपल जांच के दौरान लिया ही नहीं गया था। ऐसे में उन्होंने दोबारा DNA टेस्ट कराने की मांग की है, ताकि जैविक पितृत्व से जुड़े सवालों का वैज्ञानिक तरीके से समाधान हो सके।
जेनी ने कहा कि इस मामले में सच्चाई सामने आनी चाहिए और उनके बेटे को उसका अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने जांच एजेंसियों से पूरे मामले की नए सिरे से पड़ताल करने की मांग की है।
पुराने वकील की भूमिका पर भी उठाए सवाल
प्रेस कॉन्फ्रेंस में जेनी ने उस समय उनके पक्ष में पैरवी करने वाले अधिवक्ता शिवचरण सिंह रावत की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने उनकी गिरफ्तारी की मांग करते हुए आरोप लगाया कि पुराने मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया में कई ऐसे पहलू हैं, जिनकी दोबारा पड़ताल होनी चाहिए।
जेनी ने यह भी दावा किया कि वर्ष 2016 में उन्होंने दिल्ली में इस मामले को लेकर शिकायत दर्ज कराने का प्रयास किया था। हालांकि, उनके इन आरोपों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
धामी के बयान के बाद फिर शुरू हुई थी सियासी बयानबाजी
गौरतलब है कि जेनी प्रकरण पिछले कुछ दिनों से उत्तराखंड की राजनीति में लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। 24 अक्टूबर को हल्द्वानी में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पत्रकारों के सवालों के जवाब में कांग्रेस नेताओं का जिक्र करते हुए इस प्रकरण का उल्लेख किया था। इसके बाद पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के बीच भी तीखी बयानबाजी देखने को मिली थी।
मामले ने उस वक्त भी राजनीतिक तूल पकड़ा था, जब जेनी ने वीडियो जारी कर नेताओं से उनके नाम पर राजनीति बंद करने की अपील की थी। अब खुद प्रेस कॉन्फ्रेंस में सामने आकर पुराने आरोप दोहराने और दोबारा जांच की मांग करने के बाद यह मामला फिर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आ गया है।
2027 चुनाव से पहले आरोप-प्रत्यारोप का नया मोर्चा
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जेनी प्रकरण का दोबारा सामने आना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो गया है। एक तरफ कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ इस मामले को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच पहले से ही बयानबाजी जारी है।
हालांकि, इस पूरे मामले में जेनी की ओर से लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष भी सामने आना आवश्यक है। ऐसे में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण बेहद जरूरी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जेनी की मांग पर सरकार दोबारा जांच के आदेश देगी? क्या बेटे का DNA टेस्ट कराया जाएगा? और क्या वर्षों पुराने इस मामले की जांच से उन सवालों के जवाब मिल पाएंगे, जो लंबे समय से उठाए जा रहे हैं?
फिलहाल जेनी की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर हलचल बढ़ा दी है। अब सबकी निगाहें सरकार की कार्रवाई, जांच एजेंसियों के रुख और हरक सिंह रावत की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।






